Monday, 2 September 2019

बच्चों का X-Ray कैसे तैयार होता है, उसकी तस्वीर देखने के बाद उनकी हालत पर तरस और हंसी एक साथ आएगी

सुबह से कुछ मज़ेदार नहीं देखा तो इसे देखिए. 




जब हम आप बच्चे थे तो याद नहीं तब X-Ray कैसे निकाला जाता था. क्योंकि तब बच्चे थे न! अभी का तरीका बड़ा फ़नी है. 

छोटे-छोटे बच्चों को ट्यूब में फंसा कर खड़े कर देते हैं, यकीनन उन्हें तकलीफ़ होती होगी. आप अपनी संवेदनाएं भी प्रकट कर सकते हैं लेकिन ये भी मानना पड़ेगा कि इस पोज़ीशन में बच्चे दिखते बड़े फ़नी हैं. 

ये सिर्फ़ हमे फ़नी नहीं लग रहें, ट्विटर पर भी इन तस्वीरों को जिसने देखा वो हंसा है. यहां तक कि बच्चों के मां-बाप भी ख़ुद को हंसने से नहीं रोक पाए. 
अब ऐसा करने की वजह भी जान लेते हैं, जो की सीधा और सपाट है. X-Ray को दौरान बच्चे न हिले इसलिए उन्हें पार्दर्शी ट्यूब में पैक कर देते हैं, सिंपल.  


LED TV और LCD TV में कन्फ़्यूज़न है कौन-सा बेहतर है, इसकी पूरी जानकारी लेकर आये हैं हम

घर में नया टीवी लाने के सवाल पर आजकल कौन सा टीवी लाया जाए, इस बात पर बहस होती है. कोई कहता है कि LED TV बढ़िया है, तो कोई LCD TV को बेस्ट बताता है. आपकी इसी दुविधा को आज हम क्लीयर करेंगे और जानेंगे कि इनमें क्या अंतर होता है और किसे ख़रीदना बेहतर होगा.

LCD की फ़ुल फ़ॉर्म है Liquid-Crystal Display. मतलब LCD मुख्य रूप से टीवी का फ़्लैट-पैनल डिस्पले है. इसकी खोज George H. Heilmeier ने की थी, जो अमेरिका के एक इलेक्ट्रिकल इंजीनियर थे. दोनों प्रकार के टीवी इसी डिस्पले पर काम करते हैं. 

ये वास्तव में LCD-backlit LCD TV होते हैं. इनमें LCD को प्रकाशित करने के लिए उसके पीछे LCD बल्ब लगाए जाते हैं.  

ये LED-backlit LCD TV होते हैं. इनके अंदर LCD को प्रकाशित करने के लिए उसके पीछे LED बल्ब फ़िट किए जाते हैं. 
बोलने में कोई दिक्कत न हो इसलिए इन्हें शॉर्ट फ़ॉर्म में LED TV और LCD TV कह कर बुलाया जाता है. 
कौन है बेहतर?

LED TV और LCD TV में LED TV को बेस्ट माना जाता है. क्योंकि ये दूसरे की तुलना में कम बिजली की ख़पत करते हैं. साथ ही इनकी पिक्चर क्वालिटी बहुत ही अच्छी होती है. LED TV दूसरे की तुलना में कहीं ज़्यादा दिनों तक चलते हैं. हालांकि, इनकी क़ीमत LCD TV की तुलना में अधिक होती है.

LCD TV की तुलना में LED TV बहुत ही स्लिम होते हैं. LED TV RGB Spectrum पर काम करते हैं. इसमें LCD TV की अपेक्षा अधिक कलर उपलब्ध होते हैं. कलर कॉन्ट्रॉस्ट भी इनका अच्छा होता है.

अब तो आप LED और LCD TV में अंतर समझ गए होंगे. अब ये आपके ऊपर है कि आप कौन-सा टीवी अपने घर लाते हैं. 

भारत में बस चुका पूर्व चीनी सिपाही 54 साल बाद चीन गया, अब वापस भारत आने को तरस रहा है


Wang Chang Qi नाम का चीनी सिपाही भारत-चीन युद्ध के वक़्त भारतीय सीमा में आने के बाद वापसी का रास्ता भूल गया. हिन्दुस्तानी फौज द्वारा पकड़े जाने के बाद उसने ख़ुद को सर्वेक्षक बताया लेकिन उसके ऊपर जासूसी का आरोप लगा. भारतीय क़ानून के हिसाब से मुकदमा चलाया गया. सात साल की सज़ा हुई, जो Wang Chang ने मध्यप्रदेश के बालाघाट जेल में काटी. 
जेल से छूटने के बाद Wang Chang मध्यप्रदेश के Tirodi गांव में ही बस गया. पहले एक आटा मिल में काम किया फिर अपनी एक किराने की दुकान डाल ली. उसने एक भारतीय महिला से शादी की, चार बच्चे हुए, दो लड़की और दो लड़के. 
साल 2017 में Wang एक चीनी अधिकारी से मिला, जिसने बाद में उसको वापस अपने परिवार से चीन में मिलने जाने में सहायता की. मल्टी-एंट्री वीज़ा की मदद से Wang 2017-18 में दो बार अपने बड़ा भाई से मिलने चीन गए. 2018 के अक्टूबर में जब Wang चीन अपने परिवार के पास गए तब से वो भारत वापस नहीं आए. मार्च, 2019 में उनका वीज़ा न रिन्यू हो सकने की वजह से उनकी वापसी रुक गई है. 
बेटे Vishnu Wang(38) के अनुसार उसके 80 साल के पिता ने अप्रैल में ही चीन में वीज़ा के लिए आवदेन डाल दिया था. लेकिन सकारात्मक जवाब नहीं मिला. भारत में भी उनका परिवार अधिकारियों से संपर्क करने की कोशिश कर रहा है लेकिन बात नहीं बन रही. 
मैंने विदेश सचिव और संयुक्त सचिव को मेल लिखा, लोकिन कोई प्रतिक्रिया नहीं आई. यहां और चीन के दूतावास के अधिकारियों का कहना है कि वो एक-दूसरे की प्रतिक्रिया का इंतज़ार कर रहे हैं.
                    - Vishnu Wang
Vishnu बालाघाट की एक बारुद फ़ैक्ट्री में काम करते हैं. उनका कहना ही कि दोनों देश की सरकारें ही उनके परिवार की किस्मत तय करेगी. वो लोग पूरी तरह से चीन में शिफ़्ट होने के लिए भी तैयार हैं. 

मुग़ल सल्तनत के चौथे बादशाह जहांगीर का नाम कैसे पड़ा 'नुरुद्दीन जहांगीर'? बहुत रोचक है ये किस्सा

जहांगीर मुग़ल सल्तनत के चौथे बादशाह थे. उन्होंने 1605-1627 तक हिंदुस्तान पर राज़ किया था. उन्होंने अपने शासन में कई ऐतिहासिक जंग जीती थीं, जिसके लिए आज भी उन्हें याद किया जाता है. लेकिन उनका नाम जहांगीर कैसे पड़ा, इसका भी एक दिलचस्प किस्सा है. चलिए आज आपको अक़बर के बेटे और शाहजहां के पिता के नाम से जुड़ा ये दिलचस्प किस्सा भी बता देते हैं.

जहांगीर का पूरा नाम मिर्ज़ा नूरुद्दीन बेग मोहम्मद ख़ान सलीम था. उनके जन्म का किस्सा मुग़लिया इतिहास में बहुत ही सम्मान से लिखा गया है. जहांगीर उर्फ़ सलीम अक़बर और अमर के राजा भारतमल की बेटी मरियम उज़ ज़मानी उर्फ़ जोधाबाई की संतान थे. 
कहते हैं कि जब अक़बर की रानी जोधाबाई गर्भवती थीं तब उन्होंने रानी को फ़तेहपुर सीकरी के मशहूर संत शेख सलीम चिश्ती के यहां भेज दिया. अक़बर चाहते थे कि उनका वारिश संत चिश्ती के साए में इस दुनिया में आए

क्योंकि उन्होंने ही अक़बर को तीन बेटे होने का वरदान दिया था. फ़तेहपुर सीकरी में ही जहांगीर का जन्म हुआ. अक़बर ने उसका नाम उन्हीं संत के नाम पर सलीम और शेखू रखा था. प्यार से अक़बर अपने बेटे को इन्हीं दोनों नाम से पुकारते थे.

1605 में अक़बर की मृत्यु के बाद सहज़ादे सलीम को मुग़ल सल्तनत का बादशाह घोषित किया गया. लेकिन उस समय तुर्की के एक शासक का नाम भी सलीम हुआ करता था. सलीम नाम को लेकर इतिहासकारों में कोई संशय न हो इसलिए उन्होंने अपना नाम बदलकर जहांगीर रख लिया, जिसका मतलब होता है 'दुनिया को जीतने वाला.' 

हालाकिं, कुछ लोग इस बात से इत्तेफ़ाक नहीं रखते. उनका कहना है कि कुछ पीर और संतों ने ये भविष्यवाणी की थी कि अक़बर के मरने के बाद नुरुद्दीन नाम का शख़्स बादशाह बनेगा. इसलिए सलीम ने अपना नाम ख़ुद नुरुद्दीन जहांगीर रख लिया था. 
जहांगीर के नाम से जुड़े इस किस्से को अपने दोस्तों से शेयर करना मत भूलिएगा.

सरहदों को भुला कर भारत-पाकिस्तान की दो लड़कियों ने रचाया ब्याह, मोहब्बत ज़िंदाबाद!

उन का जो फ़र्ज़ है वो अहल-ए-सियासत जानें, 
मेरा पैग़ाम मोहब्बत है जहां तक पहुंचे 
'जिगर मुरादाबादी' के शेर से ही इस बात की शुरुआत हो सकती है. भारत-पाकिस्तान के सियासतमंद लोग परमाणु हमले, जंग, व्यापार का रोकना आदि की बातें कर रहे हैं मगर मोहब्बत करने वालों के ये बातें कहां समझ आती हैं. 

सोशल मीडिया पर बियांका और सायमा की तस्वीरें घूम रही हैं. बियांका भारत की रहने वाली हैं, और सायमा पाकिस्तान से ताल्लुक़ रखती हैं. दोनों की मुलाक़ात अमेरिका में एक इवेंट के दौरान हुई. 
कुछ ही दिनों बाद उन्होंने शादी करने का फ़ैसला ले लिया. बियांका मयली एक कोलंबियाई-भारतीय ईसाई हैं और सायमा पाकिस्तानी मूल की मुस्लिम. इनकी शादी अमेरिका के कैलिफ़ॉर्निया में संपन्न हुई. 
शादी की तस्वीरों में दोनों बेहद ख़ुश और ख़ूबसूरत लग रही हैं. इन तस्वीरों के इंटरनेट पर ख़ूब प्यार मिल रहा है. बियांका ने इन तस्वीरों के अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर भी अपलोड किया है और सबके लिए अलग-अलग कैप्शन भी लिखा है.   

छोटी सी उम्र में पोलियो, 10 स्कूल और 28 जॉब रिजेक्शन से भी नहीं टूटी गीता चौहान और बनीं चैम्पियन


इसकी जीती जागती मिसाल हैं गीता चौहान. गीता ने अपने पिता की नफ़रत और मां के प्यार से दुनिया की वो जंग जीत ली, जिसे जीतना मुश्क़िल था लेकिन नामुमकिन नहीं. 

Humans Of Bombay में आई गीता चौहान की आपबीती आपलोगों को हिम्मत दे देगी. गीता आज मुंबई की Women Wheelchair Basketball Team की खिलाड़ी हैं और एक सफ़ल बिज़नेसवुमेन, इंटरनेशनल बास्केटबॉल चैम्पियन और नेशनल टेनिस चैम्पियन हैं. मगर इनका ये सफ़र आसान नहीं था. 


गीता ने बताया,
जब वो महज़ 6 साल की थीं, तो पता चला कि उन्हें पोलियो है. उनके पोलियो ने शरीर को ही नहीं, बल्कि उनके रिश्तों को भी अपंग कर दिया. गीता की मां हमेशा उनके साथ रहीं, लेकिन उनके पिता उनकी इस कमी को स्वीकार नहीं कर पाए और उन्हें कभी आगे बढ़ने के लिए प्रेरत नहीं किया. 


मगर उनकी मां ने कभी हार नहीं मानी. गीता की जब स्कूलिंग शुरू हुई तो उन्हें 10 स्कूलों ने रिजेक्ट कर दिया था. उसके बाद एक स्कूल ने उन्हें एडमीशन दिया, लेकिन उनके पिता नहीं चाहते थे कि वो स्कूल जाएं. उनकी मां की ज़िद्द ने उन्हें स्कूल भेजा. गीता को स्कूल में भी अपने पिता जैसे लोग मिले. वहां पर कुछ बच्चों के पेरेंट्स गीता के पास अपने बच्चों को नहीं आने देते थे. उन्हें लगता था कि उनके बच्चे भी गीता जैसे हो जाएंगे.



इन सबके बावजूद गीता ने अपना स्कूल ख़त्म किया. इसके बाद वो ग्रैजुएशन करना चाहती थीं. मगर उनके पिता ऐसा नहीं चाहते थे, जिसके चलते उन्हें डराना और धमकाना यहां तक कि पॉकेटमनी तक देना बंद कर दिया.


गीता की मां ने अपने बचाए हुए पैसों से गीता के सपनों को उड़ान दी और ग्रैजुएशन में एडमीशन दिलाया. ग्रैजुएशन के साथ-साथ गीता ने जॉब इंटरव्यूज़ भी देना शुरू कर दिए, लेकिन उन्हें उनकी शारीरिक अक्षमता की वजह से रिजैक्शन ही मिला. गीता को एक हफ़्ते में 28 रिजैक्शन मिले मगर हिम्मत की दाद देनी पड़ेगी. उसके बाद भी गीता का इंटरव्यू का सिलसिला चलता रहा. फिर उनके भाई के दोस्त ने गीता को टेलीकॉलर की ज़ब ऑफ़र की.  

गीता के लिए जॉब 'डूबते को तिनके के सहारा जैसा था'. जॉब के बाद गीता की लाइफ़ बहुत ही अच्छी हो गई. वो रोज़ सुबह ऑफ़िस जातीं और फिर शाम को कॉलेज उसके बाद घर. किसी तरह से गीता ने अपनी ग्रैजुएशन पूरा किया और एक सिक्योर जॉब भी हो गई. 

गीता की ये कड़ी मेहनत सबको दिखी लेकिन उनके पिता को सिर्फ़ उनकी शारीरिक अक्षमता ही दिखी. इसके चलते उन्होंने गीता से जॉब छोड़ने को कहा और धमकी दी की अगर वो ऐसा नहीं करेंगी तो वो उन्हें गांव भेज देंगे.

इसके बाद गीता ने अपना घर छोड़ दिया और वो अपनी दोस्त के साथ रहने लग गईं. गीता ने कुछ दिनों के बाद ख़ुद एक घर किराये पर लिया. मगर अकेले रहना आसान बात नहीं होती. गीता भी उस दौरान टूटने लगीं. एक दिन उन्होंने 30 नींद की गोलियां खा लीं और उनके दोस्तों ने उन्हें हॉस्पिटल पहुंचाया. हॉस्पिटल के बेड पर गीता ने ख़ुद को समझा और अपनी ज़िंदगी का अहम फ़ैसला लेते हुए जॉब छोड़ने का फ़ैसला लिया.

जॉब छोड़ने के बाद गीता ने गार्मेंट्स का बिज़नेस शुरू किया. अपने बिज़नेस को ऊंचाई पर पहुंचाने के लिए गीता ने कड़ी मेहनत की. तभी उनके फ़्रेंड ने उन्हें मुंबई की Women Wheelchair Basketball Team के बारे में बताया. गीता ने वहां जाना शुरू किया. वो बताती हैं,

"मुझे बचपन में कभी भी खेलने नहीं दिया गया. इसलिए मैंने यहां जाने का निश्चय किया. मैं पूरे हफ़्ते काम करती थी फिर वीकेंड में प्रैक्टिस करती थी. ये वो जगह जहां मैं आज़ाद होती थी. कोई मुझे नहीं कहता था कि मैं ये नहीं कर सकती. मेरी टीम रोज़ प्रैक्टिस करती हमने नेशनल में हिस्सा लिया और हम जीते. ये मेरे लिए बहुत ही गर्व का पल था.,,

गीता ने आगे बताया,
आज मेरा अपना बिज़नेस है. साथ ही मैंने अपनी बास्केटबॉल, टेनिस और रेसलिंग की प्रैक्टिस को भी जारी रखा है. मेरा अपना घर है जहां मेरी एक सपनों की दुनिया है. मैंने अपने होने और जीने के लिए अपनों से लड़ा है. इन सबको पार करके आज मैं ये सब पाया है. ज़िंदगी में कितनी भी मुसीबतें हों, लेकिन उम्मीद कभी मत खोना.
अगर मुसीबतों से डरे नहीं, तो एक दिन चमकोगे ज़रूर, बस उस चमकने तक के सफ़र में धैर्य रखना और ये याद रखना कि 'सोना भी जलकर ही चमकता है'


Sunday, 1 September 2019

जयंती IT की नौकरी छोड़ कभी घर के खाने की होम डिलिवरी करती थीं, अब 11 रेस्टोरेंट की मालकिन हैं


'पूर्णब्रम्ह' शाकाहारी खाने की एक फ़ूड चेन है, मराठी खानों में इसकी विशेषता है. इसकी शुरुआत और सफ़लता की कहानी बेहद प्रेरणादायक है. 'पूर्णब्रम्ह' की फ़ाउंडर जयंती कठाले की परवरिश एक बड़े परिवार में हुई थी. जयंती ने त्योहारों के मौके पर घर में लोगों का हुजूम देखा था. जयंती अपनी सफ़लता का श्रेय अपने परिवार के ऐसे माहौल को देती हैं. बचपन से ही जयंती को खाना पकाने का शौक़ था, उन्होंने अपनी मां और दादी से घर में ही मराठी खाना पकाना सीखा था. 
साल 2006 में जयंती को ऑस्ट्रेलिया के IT फ़र्म में नौकरी मिल गई. वहां उन्हें भारतीय खाने की खूब इच्छा होती थी. जयंती ऑस्ट्रेलिया के भारतीय खानों वाले रेस्टोरेंट में भी नहीं खाती थीं, उनके लिए देसी खाने का सीधा मतलब घर में बने खाने से होता था. 
जयंती ने Orkut पर अकाउंट बना कर घर के बने 'मोदक' का विज्ञापन लगाया. पोस्ट पर उसे अच्छी प्रतिक्रिया मिली.
ये घर के बने खाने ऑफ़र करने का यह मेरा पहला तजु़र्बा था. दो साल बाद मैं बेंगलुरू में Infosys के प्रोजेक्ट मैनेजर के तौर पर शिफ़्ट हो गई. लेकिन खाने के द्वारा खुशियां बांटने की मेरी इच्छा किनारे नहीं गई. मैंने त्योहारों में ऑर्डर लेना जारी रखा.
एक ऑर्डर को जयंती अपने जीवन का बड़ा मोड़ मानती हैं. वो ग्राहकों को होम-डिलिवरी की सुविधा देती थीं, फिर भी एक बुजुर्ग इंसान दिवाली के मौके पर उसके दरवाज़े पर मिठाई लेने पहुंच गया. उसके बच्चे विदेश रहते थे, वो अपने बीमार पत्नी को सरप्राइज़ देने के लिए मिठाई ले जाना चाहते थे. 
जयंती ने अगले तीन साल महाराष्ट्र के खाने के बारे में रिसर्च किया. अपने सपने को पूरा करने के लिए वो काम भी करती रहीं, लोन भी लिया और गैरिज में एक छोटी सी खाने की दुकान खोलने के लिए दोस्तों की मदद भी ली. 
मेरे ऊपर अपने राज्य के प्रतिनिधित्व करने की एक बड़ ज़िम्मेदारी थी. मैं लोगों को बताना चाहती थी कि महाराष्ट्र का खाना पोहा और वड़ा पाव के अलावा भी बहुत कुछ है.
अगले दो साल जयंती नौकरी भी करती रहीं, परिवार को भी संभालती रहीं और रेस्टोरेंट का भी काम चलता रहा. उनके दिन की शुरुआत रात के साढ़े तीन बजे ही हो जाती थी, ऑफ़िस जाने से पहले वो खाना बना लेती थीं. नौ घंटे ऑफ़िस में काम करने के बाद घर आते ही वो अगले दिन की तैयारी में जुट जाती थीं. 
जयंती को एक ग्राहक ने बताया कि बैंक ख़ास महिला उद्यमियों के लिए स्कीम ले कर आई है. जयंती ने उसकी मदद से अपना पहला रेस्टोरेंट बेंगलुरु में खोला. शुरुआत में काफ़ी परेशानियां हुईं, आर्थिक रूप से भी घाटा झेलना पड़ा. उन्होंने पर्सनल लोन लिया, पति ने भी पैसे दिए, यहां तक कि गहनें बेचने की नौबत भी आ गई. आखिर में कर्मचारियों की सैलरी भी रोकनी पड़ी. 
मेरे ज़्यादातर कर्मचारी महिलाएं थीं, उन्होंने सेलरी को लेकर एक बार भी शिकायत नहीं की, वो सब मुझे बुरे दौर में प्रेत्साहित करती थीं.
उनकी लगातार मेहनत धीरे-धीरे रंग लाने लगी. 'पूर्णब्रम्ह' का विस्तार होने लगा. मुंबई, पूणे, अमरावती से अलावा ऑस्ट्रेलिया में भी 'पूर्णब्रम्ह' की शाखा खुल गई. उनके सभी ब्रांच में 70% औरतें ही कर्मचारी होती हैं. रेस्टोरेंट में देसी फ़ील लाने के लिए ज़मीन पर बैठ कर खाने की व्यवस्था भी होती है. 
जयंती ने खाने में महाराष्ट्र के अलग-अलग इलाकों का भी ध्यान रखा, सप्ताह का एक दिन कोल्हापुर की महालक्ष्मी थाली और कोंकण की शिव थाली परोसी जाती है. बच्चों के लिए स्पेशल बालगोपाल थाली मिलती है. 
'पूर्णब्रम्ह' की एक और चीज़ अनोखी है. खाने की बर्बादी रोकने के लिए उन ग्राहकों को बिल में 5 प्रतिशत की छूट मिलती है जो अपनी थाली में खाना नहीं छोड़ता और उन ग्राहकों से अलग से बिल का 2% वसूला जाता है, जो खाना छोड़ देते हैं. 
जयंती का मानना है कि ये उनके सफ़र की शुरुआत है, उनका सपना है कि वो देश-दुनिया में अपने रेस्टोरेंट की 5000 शाखाएं खोले, जहां भारतीयों के वैसे देसी खाने परोसे जाएं, जैसी उनकी चाहत होती है. 

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